
आवास मित्रों के तबादले में आखिर किसका ‘खेल’?
अधिकार क्षेत्र से बाहर तबादले के आरोप, जनपद CEO ज्ञानदर राम भगत की कार्यप्रणाली पर सवाल; शिकायत के बाद जांच भी उसी सिस्टम में और नतीजा ‘क्लीन चिट’!

गौरेला पेंड्रा मरवाही/गौरेला। जनपद पंचायत गौरेला में प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े आवास मित्रों के तबादले का मामला अब प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारों की सीमा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। भदौरा के आवास मित्र को सधवानी और सधवानी के आवास मित्र को भदौरा भेजे जाने के आदेश को लेकर शिकायतकर्ता ने इसे नियम विरुद्ध बताते हुए मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक शिकायत की है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जनपद CEO ज्ञानदर राम भगत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर तबादला आदेश जारी किया। इसी आरोप के चलते अब आदेश जारी करने के अधिकार, प्रक्रिया और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।


मामले की सबसे गंभीर बात यह है कि जिस निर्णय को लेकर शिकायत की गई, उसी प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर शिकायत की जांच होने और बाद में मामले को ‘क्लीन चिट’ मिलने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिकायत की जांच वास्तव में कितनी स्वतंत्र और निष्पक्ष थी?
अधिकार क्षेत्र से बाहर तबादला या नियमों की अनदेखी?

भदौरा और सधवानी के आवास मित्रों की आपसी अदला-बदली को लेकर मूल सवाल यही है कि क्या जनपद CEO को ऐसा स्थानांतरण करने का अधिकार था?
यदि स्थानांतरण के लिए किसी उच्च अधिकारी की स्वीकृति आवश्यक थी, तो क्या वह स्वीकृति ली गई? क्या जिला पंचायत स्तर से अनुमति प्राप्त की गई? क्या स्थानांतरण आदेश में तबादले का स्पष्ट प्रशासनिक कारण दर्ज किया गया?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि CEO ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी किया। यदि यह आरोप गलत है, तो संबंधित प्रशासनिक नियम, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और आदेश का आधार सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। शिकायत CEO के फैसले पर, जांच की निष्पक्षता पर ही सवाल!
मामला केवल तबादले तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ता की सबसे बड़ी आपत्ति जांच प्रक्रिया को लेकर है।

जिस अधिकारी या कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए शिकायत की गई, उसी प्रशासनिक तंत्र के भीतर यदि जांच पूरी कर दी जाती है और मामले में ‘क्लीन चिट’ दे दी जाती है, तो जांच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब सवाल है, शिकायत की जांच किस अधिकारी ने की? जांच अधिकारी की नियुक्ति किस आदेश से हुई? क्या शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया? क्या दोनों आवास मित्रों से जवाब लिया गया?
– क्या जिला पंचायत CEO या किसी स्वतंत्र अधिकारी से जांच कराई गई? क्या तबादले के अधिकार क्षेत्र और सक्षम प्राधिकारी की जांच की गई?
– क्या संबंधित नियमों की प्रति जांच रिपोर्ट में संलग्न की गई? यदि इन सभी बिंदुओं की जांच की गई है तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है?
‘क्लीन चिट’ किस आधार पर? रिपोर्ट सामने आए तो सच साफ हो!

शिकायतकर्ता का दावा है कि CM हेल्पलाइन में शिकायत के बाद मामले में क्लीन चिट दे दी गई। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्लीन चिट का आधार क्या था?
क्या जांच में केवल प्रशासनिक पक्ष को देखा गया या शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों का भी दस्तावेजी परीक्षण किया गया? क्या यह जांचा गया कि तबादला आदेश जारी करने वाले अधिकारी के पास वैधानिक अधिकार था या नहीं?
यदि जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित हुआ है कि CEO को स्थानांतरण का अधिकार था, तो संबंधित नियम सामने आने चाहिए। यदि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली गई थी, तो उसकी प्रति भी रिकॉर्ड के आधार पर उपलब्ध कराई जा सकती है। कागजों में सब कुछ सही है तो कागज सामने आने में हिचकिचाहट क्यों?
अगर आवास मित्र दोषी थे तो कार्रवाई क्यों नहीं, स्थानांतरण क्यों ?
मामले में एक और सवाल बेहद अहम है। यदि दोनों आवास मित्रों के कार्य में गंभीर लापरवाही या अनियमितता थी, तो क्या उनके खिलाफ कोई नोटिस, विभागीय जांच या अन्य कार्रवाई की गई?
और यदि दोनों के खिलाफ कोई शिकायत या गंभीर अनियमितता साबित नहीं हुई, तो फिर एक-दूसरे के क्षेत्र में तबादला करने की जरूरत क्यों पड़ी? यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक आदेश की मंशा पर अनुमान लगाने के बजाय उसके नियम, कारण, अधिकार और प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है।
जनपद CEO की कार्यप्रणाली फिर सवालों के घेरे में
गौरेला जनपद पंचायत की कार्यप्रणाली को लेकर इससे पहले भी विभिन्न मामलों में शिकायतें और सवाल सामने आते रहे हैं। ऐसे में आवास मित्रों के तबादले का यह मामला एक बार फिर जनपद कार्यालय की निर्णय प्रक्रिया, अधिकारों के प्रयोग और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर चर्चा में है। हालांकि, इन मामलों में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित दस्तावेजों, आदेशों और जांच रिकॉर्ड से ही हो सकती है।
अब जिला पंचायत के सामने असली चुनौती
अब निगाहें जिला पंचायत और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों पर हैं। यदि तबादला पूरी तरह नियमसम्मत है तो संबंधित नियम, आदेश और सक्षम स्वीकृति सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
यदि CM हेल्पलाइन की शिकायत पर स्वयं के पर स्वयं निराकरण आरोप
और यदि शिकायत की जांच उसी प्रशासनिक दायरे में हुई है, जिसके निर्णय पर सवाल उठाए गए थे, तो शिकायतकर्ता की आपत्ति दूर करने के लिए स्वतंत्र स्तर पर पुनः परीक्षण किया जाना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल—तबादला किस नियम से और ‘क्लीन चिट’ किस जांच से? भदौरा से सधवानी और सधवानी से भदौरा—दो आवास मित्र, दो क्षेत्र और एक तबादला आदेश।
लेकिन इस आदेश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या जनपद CEO ज्ञानदर राम भगत को यह तबादला करने का अधिकार था? क्या उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी किया? किस सक्षम अधिकारी की अनुमति ली गई? CM हेल्पलाइन की शिकायत की जांच किसने की?
और आखिर किस आधार पर मामले को ‘क्लीन चिट’ दी गई?
अब इस पूरे मामले का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि स्थानांतरण आदेश, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति, संबंधित नियम और CM हेल्पलाइन जांच रिपोर्ट से मिलेगा।
यदि रिकॉर्ड नियमसम्मत है तो उसे सामने लाकर सभी सवालों का जवाब दिया जा सकता है। लेकिन यदि रिकॉर्ड में अधिकार क्षेत्र, प्रक्रिया या स्वीकृति को लेकर कोई विसंगति सामने आती है, तो स्वतंत्र प्रशासनिक जांच की मांग को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।
👉विपक्ष का आरोप है कि ट्राइबल डिपार्टमेंट से मंडल संयोजक के पद से प्रमोशन के बाद पंचायत विभाग में सीईओ का पद पर पदस्थ किया गया, इनको पंचायत विभाग का ज्ञान नहीं है । ! इनको वापस किया जाए















